वक्फ बोर्ड के नए संशोधित बिल पर मौलाना अरशद मदनी की प्रतिक्रिया हास्यास्पद वसीम राईन
रिपोर्ट-अज़मी रिज़वी-अकरम खान
बाराबंकी। वक्फ बोर्ड को लेकर संसद में पेश नए संशोधित बिल पर अध्यक्ष जमीयत उलमा-ए-हिंद मौलाना अरशद मदनी की प्रतिक्रिया हास्यास्पद है।देश का 85 फीसदी पसमांदा मुस्लिम समाज जो आजादी के बाद से बंदिशों में जकड़ा हुआ है उसका खयाल जनाब मदनी को आज तक नही आया और आज जब सिंहासन हिलता दिखाई दिया तो शरीयत की आड़ ले रहे।उकसावे वाले मिजाज से उबर कर जनाब मदनी उन मसलों पर गौर फरमाएं जिससे पसमांदा समाज का भला होता हो।
यह बात ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष वसीम राईन ने अपने बयान मे कही।उन्होने कहा कि यह अपने आप मे बड़ी अजीब बात है और पसमांदा मुस्लिम समाज के साथ विडंबना है कि उसी की कौम की अगुवाई करते आ रहे मुस्लिम धर्मगुरुओ व राजनीतिक नुमाइंदों को कभी इस समाज का खयाल नही आया, कभी बड़े मंचो पर पसमांदा का जिक्र नहीं किया, कोई आंदोलन नही हुआ,कभी भी इनके बुनियादी मसलों पर विचार नहीं हुआ।तो क्या पसमांदा मुसलमान किसी गैर देश से आया है या वह भारतीय मुसलमान नही।उन्होने कहाकि अब जरा अध्यक्ष जमीयत उलमा-ए-हिंद मौलाना अरशद मदनी की ही बात कर ली जाए तो वक्फ बोर्ड को लेकर चल रही हलचल के बीच उनका बयान आ गया। जिसमे वह शरीयत की बात करते हुए सीधे मुस्लिम समाज को एक बार फिर उकसाने का काम कर रहे हैं। मतलब साफ है जब तक वक्फ के मामलों में उनकी इच्छा चलतीं रही, मन मुताबिक काम होता रहा तब तक सब ठीक अब सरकार ने अपना रुख साफ किया तो पेट दुखने लगा।सवाल इस बात का है कि इन सभी मामलों पर अपना रुख जताते आए जनाब मदनी को अब तक पसमांदा मुसलमान क्यो नही दिखा,वह समाज जो आर्टिकल 341 के तहत लगाए गए धार्मिक प्रतिबंध का दंश बरसों से झेल रहा,जो अपने बुनियादी हक से महरूम है।यह करतूत उसी कांग्रेस सरकार की है जिसके रहते यही लोग मलाई काटते रहे।
