बाराबंकी की सियासत में तूफ़ान: यासिर अराफात किदवई की दावेदारी से बदली हवा
विरासत,संघर्ष और सियासी सफर
बुजुर्गों के आशीर्वाद,युवाओं से संवाद और जरूरतमंदों की सहायता ने यासिर अराफात किदवई को बनाया एक भरोसेमंद चेहरा
रिपोर्ट-अज़मी रिज़वी

बाराबंकी। जनपद की राजनीति इस समय एक नए मोड़ पर खड़ी है। चौपालों की फुसफुसाहट अब खुली चर्चा में बदल चुकी है और हर जुबां पर एक ही नाम है यासिर अराफात किदवई। समाजवादी पार्टी से विधानसभा टिकट की उनकी दावेदारी ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है।पुराने समीकरण दरकते नजर आ रहे हैं और नए गठजोड़ आकार लेने लगे हैं।

मसौली विकास खंड की ग्राम पंचायत भयारा में जन्मे किदवई केवल एक राजनीतिक चेहरा नहीं, बल्कि एक विरासत के वाहक हैं। उनके परदादा शेख़ यासीन अली स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रहे, जिन्होंने देश की आज़ादी के लिए संघर्ष किया। उनके चाचा अब्दुल रऊफ किदवई दो बार मसौली ब्लॉक प्रमुख रहे और क्षेत्रीय राजनीति में मजबूत पहचान बनाई।

वर्ष 2002 में उन्होंने सक्रिय राजनीति की शुरुआत की, जब बहुजन समाज पार्टी ने उन्हें मसौली विधानसभा सीट से प्रत्याशी बनाया। चुनावी हार के बावजूद उन्होंने संगठन में अपनी सक्रिय भूमिका निभाई और जिला सचिव व मुस्लिम समाज के जिलाध्यक्ष जैसे दायित्व संभाले।
सादगी की राजनीति और बदलते समीकरण
वर्ष 2016 में उन्होंने समाजवादी पार्टी का दामन थामा और ब्लॉक प्रमुख पद के लिए मैदान में उतरे, जहां वे निर्विरोध चुने गए। यह जीत केवल एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि जनता के भरोसे की मुहर थी।यासिर अराफात किदवई की पहचान उनके व्यवहार से बनती है। बिना तामझाम और शोर-शराबे के वे गांवों में लोगों के बीच पहुंचते हैं। बुजुर्गों का आशीर्वाद, युवाओं से संवाद और जरूरतमंदों की सहायता ने उन्हें एक भरोसेमंद चेहरा बना दिया है।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि रामनगर विधानसभा क्षेत्र में जैसे ही उनका नाम प्रमुख दावेदारों में उभरा, बाकी नेताओं की रणनीति बदल गई।अंदरखाने बैठकों का दौर तेज हो गया है और नए समीकरणों की गणित बैठाई जा रही है।अब निगाहें समाजवादी पार्टी के फैसले पर टिकी हैं।क्या पार्टी परंपरागत समीकरणों को साधेगी या उस चेहरे पर दांव लगाएगी जिसकी लोकप्रियता गांव-गांव में महसूस की जा रही है?

बाराबंकी की राजनीति में यह केवल टिकट की लड़ाई नहीं यह भरोसे,स्वीकार्यता और जमीनी पकड़ की परीक्षा है।
हवा का रुख बदल रहा है।सवाल यही है क्या इस बार सादगी और सेवा की राजनीति को मंच मिलेगा?


